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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के फायरब्रांड नेता संगीत सोम आगामी विधानसभा चुनाव में मेरठ की सरधना सीट से एक बार फिर विधायक बनने की जुगत में हैं. वहीं दूसरी तरफ, विपक्ष ने उनके खिलाफ सियासी चक्रव्यूह रचना शुरू कर दिया है. समाजवादी पार्टी से मौजूदा विधायक अतुल प्रधान का चुनाव लड़ना तय माना जा रहा है, तो बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने विनीत भराला को अपना प्रत्याशी बनाकर जाट दांव खेल दिया है.
बसपा ने वलीदपुर इलाके में एक जनसभा आयोजित कर विनीत भराला को अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित कर दिया है. प्रत्याशी घोषित होने के बाद विनीत भराला ने दावा किया कि उन्हें सरधना क्षेत्र के समाज के हर वर्ग का वोट और समर्थन प्राप्त होगा.
विनीत भराला के चुनावी मैदान में उतरने से सरधना सीट पर मुकाबला काफी रोचक हो गया है. इसके साथ ही यह सवाल उठने लगा है कि बसपा के इस जाट कार्ड से संगीत सोम और अतुल प्रधान में से किसका चुनावी गणित बिगड़ेगा और किसको फायदा पहुंचेगा?
सरधना से विनीत भराला ने ठोकी ताल
जाट समुदाय से आने वाले विनीत भराला कुछ समय पूर्व सपा छोड़कर बसपा में शामिल हुए हैं. बसपा प्रमुख मायावती ने उन्हें सरधना विधानसभा सीट से अपना प्रत्याशी बनाया हैय विनीत का पूरा नाम विनीत चौधरी है, लेकिन वे सरधना के भराला गांव के निवासी हैं, जिस कारण वे ‘विनीत भराला’ के नाम से प्रसिद्ध हैं. उनके पिता सत्यप्रकाश भराला सरधना क्षेत्र में सपा के वरिष्ठ नेता थे और दो बार विधानसभा चुनाव भी लड़ चुके थेय
वर्ष 2008 में सत्यप्रकाश भराला की हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद उनके पुत्र विनीत भराला सपा से जुड़कर सरधना की राजनीति में सक्रिय हुएय वे सपा के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन अतुल प्रधान के वर्तमान विधायक होने के कारण टिकट मिलने की संभावना न देखकर उन्होंने बसपा का दामन थाम लिया.
विनीत भराला किसका खेल बिगाड़ेंगे?
सरधना क्षेत्र में विनीत भराला की मजबूत पकड़ मानी जाती है.य सपा के अतुल प्रधान यहां से वर्तमान विधायक हैं; उन्होंने 2022 के चुनाव में भाजपा के संगीत सोम को पराजित कर इस सीट पर कब्जा जमाया थाय अतुल प्रधान गुर्जर समुदाय से आते हैं और क्षेत्र के प्रभावशाली नेता हैं, वहीं संगीत सोम यहाँ से दो बार विधायक रह चुके हैं. इस लिहाज से मुकाबला त्रिकोणीय और दिलचस्प होने के आसार हैं.
बसपा की रणनीति दलित, मुस्लिम और जाट गठजोड़ के जरिए जीत हासिल करने की है. पूर्व में बसपा इस सीट पर विजय प्राप्त कर चुकी है, जब चंद्रवीर सिंह यहाँ से विधायक बने थे. पूर्व मंत्री हाजी याकूब कुरैशी के पुत्र हाफिज इमरान याकूब भी यहां से दूसरे स्थान पर रहे थे. पिछले कुछ समय में बसपा का वोट बैंक खिसका है, किंतु विनीत भराला की उम्मीदवारी से जाट मतदाता उनके पक्ष में गोलबंद हो सकते हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, 2012 और 2017 में संगीत सोम जाट और राजपूत मतदाताओं के केमिस्ट्री बनाकर चुनाव जीते थे. मुजफ्फरनगर दंगे के चलते भी तमाम हिंदू जातियों का वोट संगीत सोम को मिला था, लेकिन अब समीकरण बिगड़ गया है.
वहीं 2022 में सपा-रालोद (RLD) गठबंधन का लाभ अतुल प्रधान को मिला था, क्योंकि जाट मतदाता सपा गठबंधन के साथ चले गए थे. अब जबकि रालोद भाजपा के साथ गठबंधन में है, संगीत सोम को दोबार जीत की उम्मीद दिखाई दे रही थी. बसपा द्वारा जाट प्रत्याशी उतारे जाने से उनके समीकरण प्रभावित हो सकते हैं.
संगीत सोम के खिलाफ विपक्ष सियासी चक्रव्यूह
सरधना के सियासी समीकरण में बिना जाट वोट के संगीत सोम का चुनाव जीतना आसान नहीं है. जाट समुदाय पहले से ही संगीत सोम से नाराज माना जा रहा था. इसकी वजह बीजेपी के नेता संजीव बालियान है. 2024 के लोकसभा चुनाव में हार का ठीकरा बालियान ने संगीत सोम पर फोड़ा था. इसके बाद जाट बनाम ठाकुर की सियासत गर्मा गई थी.
हालांकि, आरएलडी से गठबंधन होने होने के चलते संगीत सोम को उम्मीद है कि उन्हें जाट वोट मिल जाएगा, लेकिन बसपा के जाट कार्ड खेले जाने से संगीत सोम की राह काफी मुश्किलों भरी हो सकती है. इसकी वजह सरधना सीट का सियासी समीकरण और बीजेपी नेताओं से उनकी सियासी अदावत है.
सरधना विधानसभा सीट पर हार-जीत की भूमिका पांच जातियां करती हैं. यहां पर मुस्लिम वोटर करीब एक लाख हैं तो ठाकुर समुदाय के 60 हजार वोटर्स है. जाट समाज 50 हजार है तो गुर्जर 40 हजार हैं. इसके अलावा 45 हजार से 50 हजार दलित वोटर्स हैं. ठाकुर और जाट मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ रहा है.
संगीत सोम इसी समीकरण के सहारे दो बार विधायक रहे तो सपा मुस्लिम गुर्जर और दलित समीकरण के दम पर 2022 में उन्हें हराने में सफल रही है. सरधना में ठाकुर बाहुल्य ‘ठाकुर चौबीसी’ क्षेत्र आता है, जो चुनाव परिणामों को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन जाट वोटों के बिना संगीत सोम के लिए जीतना आसान नहीं है.
संजीव बालियान ने जिस तरह से मोर्चा खोल रखा है और जाटों से 2024 की हार का हिसाब बराबर करने की बात कर रहे हैं, ऐसे में बसपा ने भी जाट दांव खेला है, उससे अब संगीत सोम की चिंता बढ़ा दी है. गुर्जर समाज पहले ही सरधना में बीजेपी से दूर हो चुका है और अतुल प्रधान ने जिस तरह दलित समुदाय को भी उनके खिलाफ करने में जुट गए हैं, उ ससे संगीत सोम के लिए सियासी राह में मुश्किलें काफी पैदा हो सकती है.
सरधना विधानसभा सीट का सियासी समीकरण भले ही बीजेपी के पक्ष में हो, लेकिन संगीत सोम के लिए किसी तरह से मुफीद नहीं दिख रहा है. संगीत सोम ने आरएलडी नेता जयंत चौधरी के साथ भी अपने रिश्ते पहले से ही बिगाड़ रखे हैं. ऐसे में संगीत सोम की वापसी काफी मुश्किल भरी लग रही है. ऐसे में देखना है कि संगीत सोम कैसे जाट चक्रव्यूह को तोड़ पाते हैं?
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